जेहन जब गुजरे लम्हों को कभी वापस बुलाता है

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जेहन जब गुजरे लम्हों को कभी वापस बुलाता है
सिवा तेरे हमें अक्सर बहुत कुछ भूल जाता है

हमारे हौसलों को देखकर सूरज नें पूछा था
जुगनुओं के लिए लश्कर मुखातिब कौन आता है

बसा ली है निगाहों में उसकी सूरत जबसे हमनें
हमारा चेहरा अब आईना कब हमको दिखाता है

भरे रहते हैं अखबारों के पन्ने इस्तेहारों से
खबर की जगह अब अखबार तो बाजार लाता है

फकीरों की कतारे हैं लकीरों पर खड़ी राकि़म
उसे कहते हैं पागल जो नयी राहें बनाता है

हमारे गम के आलावा नहीं कोई हमारा था

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हमारे गम के आलावा नहीं कोई हमारा था
हमें ताल्लुक नें लूटा था हमें रिश्तों ने मारा था

कभी भी आप अपने से नहीं मैं जीत पाया था
शिकायत क्या करुँ किससे कहूँ क्या कैसे हारा था

रिवाज-ए-रस्म-ए-कारोबार हमको कब समझ आये
हमेशा ही हमारे हिस्से में नुकसान सारा था

तुम्हारे हाथ में तलवार थी देखा था हमने भी
चलाने के लिए लेकिन किया किसने ईशारा था

सितारा चमके किस्मत का दुआ क्या माँग ली मैने
गिरा जो मेरे दामन में मेरी किस्मत का तारा था

मयस्सर थी कहाँ हमको यक ब यक मौत भी राकि़म
कातिलों नें जहर रग में कतरा कतरा उतारा था

बहुत कुछ आप अपने को बताना भी जरुरी था

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रिवाज-ए-रस्म-ए-तन्हाई निभाना भी जरुरी था
बहुत कुछ आप अपने को बताना भी जरुरी था

समझते हम भी उसको थे समझता वो भी हमको था
मगर इन्कार करने को बहाना भी जरुरी था

यकीनन काम आयेंगे पड़ेगा लौटना जब भी
निशाँ कुछ रुक के राहों में लगाना भी जरुरी था

नहीं मंजूर थी हमको हँसी झूठी कभी लेकिन
गम-ए-दिल को जमाने से छिपाना भी जरुरी था

हथेली जलने का था खौफ हर लम्हा मगर फिर भी
हवाओं से चरागों को बचाना भी जरुरी था

रहे कैसे मेरे रहते कोई इल्जाम आवारा
उसे तो आदतन सर मेरे आना भी जरुरी था

बराबर दोनों थी लाजिम गजल कहना या मजदूरी
कि राकि़म पेट की खातिर कमाना भी जरुरी था

किसी कीमत बिना नफरत सियासत हो नहीं सकती

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किसी कीमत बिना नफरत सियासत हो नहीं सकती
हकीकत और कुछ हो तो हकीकत हो नहीं सकती

अता जो मौत करती है वही मोहलत जिन्दगी है
फितरतन मौत से वैसे मुरव्वत हो नहीं सकती

मुहब्बत है इमारत तो यकीं बुनियाद है इसकी
शिकायत और सुब्हे में मुहब्बत हो नहीं सकती

तंज बर्दाश्त करने की कहीं तो कोई हद्द होगी
कहा किसने खफा मेरी तबीयत हो नहीं सकती

बिसाती बैठे हैं आढत पे गुंजाईश न समझेंगे
वगरना कीमतों में कब रिआयत हो नहीं सकती

भरोसा तोड़ता है वो भरोसा जिस पे होता है
सिवा इसके एहतियातन नसीहत हो नहीं सकती

नहीं मोहताज होती है लफ्ज और हर्फ की राकि़म
अगर है तो मुहब्बत की इबारत हो नहीं सकती

आखिर ताल्लुक तोड़ा बाकी

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पाया तुझको छोड़ा बाकी
आखिर ताल्लुक तोड़ा बाकी

सबसे ज्यादा तेरी कीमत
हमनें मुनाफा जोड़ा बाकी

रखकर आँख में थोड़ा पानी
अपना जिस्म निचोड़ा बाकी

सनद है कितनी रेत गर्म थी
तलवों में है फोड़ा बाकी

किस्से कहानी राजा रानी
ना हाथी ना घोड़ा बाकी

वरना मंजिल थी कदमों में
राहों में था रोड़ा बाकी

पूरे दुख को देखो राक़िम
सारी वजह है थोड़ा बाकी


सच से ज्यादा झूठ सही है

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हर जानिब दस्तूर यही है
सच से ज्यादा झूठ सही है

वरना बैठी होती तितली
इन फूलों में कुछ तो कमी है

तुझको मुश्किल में देखेंगे
हमनें भी दुनिया देखी है

गफ्लत थी दस्तक की शायद
दरवाजे पर कोई नहीं है

डूब रही हैं आँखें क्योंकर
आईना है या कि नदी है

याद नहीं लेकिन कातिल की
सूरत मुंसिफ से मिलती है

नाकाबिल हैं आँखें राकिम
क्या असली है क्या नकली है

कई पुश्तें हुईं हम गाँव अपने घर नहीं लौटे

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कमाने पुरखे जो निकले थे वो अक्सर नहीं लौटे
कई पुश्तें हुईं हम गाँव अपने घर नहीं लौटे

हुए पैवस्त इस दर्जा हमारी पीठ में गहरे
गिरेबाँ में कभी वापस तेरे खंजर नहीं लौटे

गरीबों के कटे पेटों पे आँखें हैं मुनाफे की
जो इनकी जद में आ जाये कभी बचकर नहीं लौटे

किया है अपने सर को सामने ये सोचकर हमनें
जो तूने फेंका है वो रायगां पत्थर नहीं लौटे

पहुँच आये हैं खेतों तक इमारत के घनें जंगल
मुखालिफ गाँव था फिर भी शहर मुडकर नहीं लौटे

वो जिसके वास्ते मंदिर गये मस्जिद गये राकि़म
वो दिल में रहता था हम ही कभी अंदर नहीं लौटे