इक दूसरे से क्यों हैं खफा आदमी के तौर

Posted by Raqim

इक दूसरे से क्यों हैं खफा आदमी के तौर।
लगते नहीं हैं अच्छे किसी को किसी के तौर।।

जी करता है कि हाथों से आँखें समेट लूँ।
देखे नहीं जाते हैं मुझसे जिन्दगी के तौर।।

गरूर बडप्पन का दोस्तों को हो गया।
आ गये हैं तौर में अब बेरूखी के तौर।।

अपने चलन को देखना यहाँ गुनाह है।
खुद को छोड़ देखिये यहाँ सभी के तौर।।

है नाव धूप की मेरी दरिया है रेत का।
चलते हैं हम सराब में लेकर नदी के तौर।।

जेहन मुनाफाखोर है दिल बेईमान है।
खुदगर्ज आजकल हैं बहुत दोस्ती के तौर।।

लगती है आसान मौत ऐसे लोगों को।
देखे हैं जिन लोगों ने मुफलिसी के तौर।।

9 comments:

  1. Patali-The-Village

    कविता अच्छी लगी धन्यवाद|

  1. AlbelaKhatri.com

    behtareen gazal.........

  1. वीना

    है नाव धूप की मेरी दरिया है रेत का।
    चलते हैं हम सराब में लेकर नदी के तौर।।

    बहुत अच्छी गजल

  1. Bhushan

    बहुत दिनों के बाद एक उम्दा ग़ज़ल पढ़ने को मिली. बहुत ही बढ़िया.

  1. Surendra Singh Bhamboo

    हमारे एगरीगेटर पर आपका ब्लाग जोड़ने के लिए धन्यवाद
    आपके ब्लाग को सफलता पूर्वक जोड़ दिया गया है। अब आप इस एगरीकेटर के लोगों को अपने ब्लाग पर लगा सकते है। जिसे आपकी पोस्ट तुरंत छप सके और आप ज्यादा से ज्यादा लोगों के ब्लाग पर टिप्पणियां देने की
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  1. राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh)

    मानवीय संवेदनाओं को उकेरती बेहतरीन ग़ज़ल कही है| हर शेर मार्के के है| इस खूबसूरत शायरी के लिए दाद कबूलिये|

    ब्रह्माण्ड

  1. संगीता स्वरुप ( गीत )

    खूबसूरत रचना ..

  1. संगीता पुरी

    हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

  1. जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar

    ये दोनों शे’र बेहद पसंद आये--

    १."जी करता है कि हाथों से आँखें समेट लूँ।
    देखे नहीं जाते हैं मुझसे जिन्दगी के तौर।।"

    २."जेहन मुनाफाखोर है दिल बेईमान है।
    खुदगर्ज आजकल हैं बहुत दोस्ती के तौर।।"

    कुल मिलाकर इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए पीठ थपथपाने का मन कर रहा है..भाई! लेकिन क्या करूँ...रेनूकूट मेरे यहाँ से लगभग 35 किमी दूर है। इस बार जब भी आऊँगा यही ग़ज़ल सुनूँगा...
    सबसे पहले...ठीक बा न?