ईश्क की शुरूआत एक बार फिर से हो

Posted by Raqim

इस बार न गलती कोई मेरे यार फिर से हो।
ईश्क की शुरूआत एक बार फिर से हो।।

हमने दुआ माँगी थी हो के ईश्क में रूस्वा।
यारब न कोई मुझ सा शर्मशार फिर से हो।।

नये ईश्क से बेदखल जमाने को करो।
राह में रोड़ा न कोई खार फिर से हो।।

रोये न कोई लैला अब दोबारा ईश्क में।
अब न कोई मजनू संगसार फिर से हो।।

दीवार और सलाखें नये ईश्क में न हों।
आशिक न कोई अब के गिरफ्तार फिर से हो।।

राकिम जमाना ईश्क को कहे है अगर गुनाह।
दो चार फिर से हो सौ हजार फिर से हो।।

1 comments:

  1. Nasimuddin Ansari

    भाई धनञ्जय
    हर मिसरे में इश्क की बात ....
    यहाँ ... दाल ७० रूपया किलो हो गयी है और पट्रोल भी ७० के करीब ....
    घोटाला .. कई हज़ार करोड़ों में ... गरीबी कागज़ पर मिटती जा रही है .. जमीन पर बढ़ती ...
    शहर में आदमी मकान के ऊपर मकान उसके ऊपर मकान बनाये जा रहा है ..गाँव से आये मजदूर की रिहाईस के लिए और किराया उगाहने के लिए .. ...जिन मकानों में पानी भी चढाने से मन कर देता है ...
    चाँद फीसदी लोग हर शहर में एक मकान खरीद कर थापा के हवाले रखवाली करा रहे है .. क्यों की रहने वाला कोई नहीं इतने मकानों में ..
    ज्यादातर लोग बीबी बच्चों और बुजुर्ग को गाँव में छोड़ कर रोटी कमा रहे है .. साहब की गाली खा रहे है .. वोह लोग इतने सरे इश्क के अल्फाज़ पढ़ते पढ़ते थक नहीं जायेंगे ... ??