रात की परछाईयाँ समेंटने चलो

Posted by Raqim

रात की परछाईयाँ, समेंटने चलो।
फैली हुयी तन्हाईयाँ, समेंटने चलो।।

पत्तों पे सोयी हुई है, नीम रोशनी।
चाँद की बीनाइयाँ, समेंटने चलो।।

रेत है या समन्दर की, बदगुमानी है।
आँख से गहराइयाँ, समेंटने चलो।।

जलते बुझते जुगनुँओं की कतार में।
अंधेरों की जेबाइयाँ, समेंटने चलो।

आज उसके कूचे,तन्हा चलो राकिम।
अपनी ही रूस्वाइयाँ, समेंटने चलो।।

1 comments:

  1. जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar

    राक़िम भाई,
    ब्लॉग-जगत्‌ में प्रवेश के लिए बधाई!

    यार, एक छोटी-सी ग़लती आप कर गये हैं। ‘परछाई’ का बहुवचन ‘परछाइयाँ’ होगा। यही बात ‘तन्हाई’ पर लागू होगी। आगे क्रम में ‘गहराइयाँ’, आदि सब सही हैं। ‘जुगनुँओं’ पर अनुनासिक (यानी, चन्द्रबिन्दु) नहीं रहना चाहिए।

    लगता है कि Type करते समय आपका ध्यान नहीं गया होगा...शायद!