हम जुगनुओं के साथ गली में निकलते हैं

Posted by Raqim

जब रोशनी के खौफ कहीं दूर ढलते हैं
हम जुगनुओं के साथ गली में निकलते हैं

क्या बढ गया है दरम्यान बोझ फिक्र का
क्यों माथे पर पसीने के कतरे फिसलते हैं

कैसे हो मेरे डूबने का उनको एतबार
पानी में हवाओं के बुलबुले उबलते हैं

तादाद ऐसे लोगों की शहर में बढ गई
वक्त बदलते ही रंग जो बदलते हैं

रोज निकल जाती है कुछ उम्र हाथ से
हम रोज रख के हाथों पे हाथ मलते हैं

है इतनी ज्यादा तेज धूप मेरे ख्वाब में
राकि़म जी मेरी नींद के भी पाँव जलते हैं