कोई नहीं आया मेरे आने के बावजूद

Posted by Raqim


दरवाजे की जंजीर हिलाने के बावजूद
कोई नहीं आया मेरे आने के बावजूद

मुझमें इतनी आग कहाँ से इकट्ठा थी
जलती है जमीं खाक उठाने के बावजूद

मजबूरियों के बोझ से हिलती न थी जुबान
हम सुनते रहे सिर्फ सुनाने के बावजूद

देखा है दरम्यान ढूँढकर के जिन्दगी
कुछ न मिला नब्ज दबाने के बावजूद


निगाह थी कि गैर के ही ऐब पर रही
अपने ऐब लाख गिनाने के बावजूद

बेचैन रहेंगे वो मेरे खाक होने तक
करार नहीं आग लगाने के बावजूद