हमारे गम के आलावा नहीं कोई हमारा था

Posted by Raqim

हमारे गम के आलावा नहीं कोई हमारा था
हमें ताल्लुक नें लूटा था हमें रिश्तों ने मारा था

कभी भी आप अपने से नहीं मैं जीत पाया था
शिकायत क्या करुँ किससे कहूँ क्या कैसे हारा था

रिवाज-ए-रस्म-ए-कारोबार हमको कब समझ आये
हमेशा ही हमारे हिस्से में नुकसान सारा था

तुम्हारे हाथ में तलवार थी देखा था हमने भी
चलाने के लिए लेकिन किया किसने ईशारा था

सितारा चमके किस्मत का दुआ क्या माँग ली मैने
गिरा जो मेरे दामन में मेरी किस्मत का तारा था

मयस्सर थी कहाँ हमको यक ब यक मौत भी राकि़म
कातिलों नें जहर रग में कतरा कतरा उतारा था