कहो मुबारक साल नया है

Posted by Raqim


नई उम्मीदों का चेहरा है
कहो मुबारक साल नया है

अबके साल भला सब होगा
जो होगा अच्छा अब होगा
जख्म पुराने फिर न कुरेदो
जो था बुरा वो बीत गया है
कहो मुबारक..........

बात पुरानी मत दोहराओ
भूली कहानी मत दोहराओ
मत दोहराओ फसाद के किस्से
बोलो सब कुछ भूल चुका है
कहो मुबारक..........


करना मत लाशों पे सियासत
फैलाना मत नाहक नफरत
कह दो सियासतदानों से
चेहरा चुल्लू में डूब रहा है
कहो मुबारक..........


अबके साल न जुल्म कहीं हो
मौत भूक से अब न कोई हो
बची रहे बेटी की अस्मत
मेरी बस इतनी ही दुआ है
कहो मुबारक..........


चैन अमन दिन में रातों में
बरसेगा अमृत बातों में
कोशिश नई सही ही करिये
शायद ऐसा हो सकता है
कहो मुबारक..........

खत्म हुई यूँ मेरी तलाश बारहा

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खत्म हुई यूँ मेरी तलाश बारहा
आखिरश मिला वो मेरे पास बारहा

ले आई खींचकर के समन्दर तलक उसे
दरियाओं को डुबोती है यूँ प्यास बारहा

चेहरों पे वक्त सिलवटों की शक्ल में दिखा
सच होता नहीं देखा हुआ काश बारहा

होता हूँ नुमायाँ मैं अब फरेब ओढकर
सर पीटते हैं अब नजरशनाश बारहा


आम आदमी है आम हो के परीशां
फिरते हैं यूँ इतराते हुए खास बारहा

जीते हैं जिन्दगी को हम रिवाज की तरह
आती नहीं है वरना हमें रास बारहा

अपने वजूद को जो कभी देखा गौर से
राकि़म जी नागहाँ हुए उदास बारहा


क्या कहाँ वक्त के सिवा बदला

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न जमीं न तो आसमाँ बदला
क्या कहाँ वक्त के सिवा बदला

उम्र नें सूरतों को बदला था
बेवजह हमने आईना बदला

आदती हमसफर थे साजिश के
हमने उकता के रास्ता बदला

कल तलक था शुकून बस्ती में
उनकी आमद नें मामला बदला

जिसने कोशिश की थाम ली उँगली
उसने तकदीर का लिखा बदला

एक तू ही नहीं हुआ हासिल
सिर मेरा कितने आस्ताँ बदला

मौत से ज्यादा बुरा था राकि़म
जिन्दगी नें था जब लिया बदला

काबू में आदमी न रहा क्या करे खुदा

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है मुश्किलों में खुद खुदा क्या करे खुदा
काबू में आदमी न रहा क्या करे खुदा

इक दूसरे को कत्ल आदमी अगर करे
दो आदमी के दरम्याँ क्या करे खुदा

अपनी नजर में आदमी हो गया खुदा
मगर निगाहे गैर का क्या करे खुदा

यहाँ पे लोगबाग हैं तबाह इस कदर
चाहकर के भी भला क्या करे खुदा


राकिम नसीब हो गया नसीब में जो था
तुम्हीं कहो कि कुछ सिवा क्या करे खुदा


कोई नहीं आया मेरे आने के बावजूद

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दरवाजे की जंजीर हिलाने के बावजूद
कोई नहीं आया मेरे आने के बावजूद

मुझमें इतनी आग कहाँ से इकट्ठा थी
जलती है जमीं खाक उठाने के बावजूद

मजबूरियों के बोझ से हिलती न थी जुबान
हम सुनते रहे सिर्फ सुनाने के बावजूद

देखा है दरम्यान ढूँढकर के जिन्दगी
कुछ न मिला नब्ज दबाने के बावजूद


निगाह थी कि गैर के ही ऐब पर रही
अपने ऐब लाख गिनाने के बावजूद

बेचैन रहेंगे वो मेरे खाक होने तक
करार नहीं आग लगाने के बावजूद


हम जुगनुओं के साथ गली में निकलते हैं

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जब रोशनी के खौफ कहीं दूर ढलते हैं
हम जुगनुओं के साथ गली में निकलते हैं

क्या बढ गया है दरम्यान बोझ फिक्र का
क्यों माथे पर पसीने के कतरे फिसलते हैं

कैसे हो मेरे डूबने का उनको एतबार
पानी में हवाओं के बुलबुले उबलते हैं

तादाद ऐसे लोगों की शहर में बढ गई
वक्त बदलते ही रंग जो बदलते हैं

रोज निकल जाती है कुछ उम्र हाथ से
हम रोज रख के हाथों पे हाथ मलते हैं

है इतनी ज्यादा तेज धूप मेरे ख्वाब में
राकि़म जी मेरी नींद के भी पाँव जलते हैं

हम हो चुके हैं आदतन गुलाम कान से

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हम हो चुके हैं आदतन गुलाम कान से
सुन सुन के सरासर हुकुम तमाम कान से

आँखों से अपाहिज हैं न जेहन से हैं लाचार
फिर भी क्यों लेते हैं सिर्फ काम कान से

कौन जाने किसने उसके कान भर दिये
वो सुनना भी न चाहे मेरा नाम कान से

हकीकतों से वास्ता किसी को कुछ नहीं
हर इंकलाब मुँह से इंतजाम कान से

काबू में करने के लिए हमारे जेहन को
डाली गई अल्फाजों की लगाम कान से

कानों को पिरो देते हैं अफवाहों के धागे
जुड़ जाते हैं राकि़म जी खासोआम कान से

किस तरह के रिश्ते को कैसे निभाना था

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किस तरह के रिश्ते को कैसे निभाना था
आसाँ नहीं ये मसअला समझ में आना था

बाप थे बुजुर्ग माँ बीमार थी मगर
पुराना ही सही सिर पे शामियाना था

अल्लाह नें मजलूमों को सिर ही क्यों दिया
हर बात पे जब हर जगह इसे झुकाना था

तुझसे मिल के आज यही सोच रहा हूँ
क्या याद रखना था मुझे क्या भूल जाना था

वो तो जानते थे हर सवाल का जवाब
मंसूबा उनका बस हमें आजमाना था

इक दूसरे के सुख में दुख में होते थे शरीक
ऐसे भी आदमी थे ऐसा जमाना था

है इत्तिफाक लग गया है तीर जगह पर
कह रहें हैं लोग कि मुश्किल निशाना था

दरअस्ल इरादा खुदकशी का था राकि़म
समन्दर में मोती ढूँढना तो इक बहाना था