सच से ज्यादा झूठ सही है

Posted by Raqim

हर जानिब दस्तूर यही है
सच से ज्यादा झूठ सही है

वरना बैठी होती तितली
इन फूलों में कुछ तो कमी है

तुझको मुश्किल में देखेंगे
हमनें भी दुनिया देखी है

गफ्लत थी दस्तक की शायद
दरवाजे पर कोई नहीं है

डूब रही हैं आँखें क्योंकर
आईना है या कि नदी है

याद नहीं लेकिन कातिल की
सूरत मुंसिफ से मिलती है

नाकाबिल हैं आँखें राकिम
क्या असली है क्या नकली है

कई पुश्तें हुईं हम गाँव अपने घर नहीं लौटे

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कमाने पुरखे जो निकले थे वो अक्सर नहीं लौटे
कई पुश्तें हुईं हम गाँव अपने घर नहीं लौटे

हुए पैवस्त इस दर्जा हमारी पीठ में गहरे
गिरेबाँ में कभी वापस तेरे खंजर नहीं लौटे

गरीबों के कटे पेटों पे आँखें हैं मुनाफे की
जो इनकी जद में आ जाये कभी बचकर नहीं लौटे

किया है अपने सर को सामने ये सोचकर हमनें
जो तूने फेंका है वो रायगां पत्थर नहीं लौटे

पहुँच आये हैं खेतों तक इमारत के घनें जंगल
मुखालिफ गाँव था फिर भी शहर मुडकर नहीं लौटे

वो जिसके वास्ते मंदिर गये मस्जिद गये राकि़म
वो दिल में रहता था हम ही कभी अंदर नहीं लौटे








मेरा फेंका हुआ पत्थर मेरे सर लौट आता है

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गलत मंसूबा उम्मीदों से दीगर लौट आता है
मेरा फेंका हुआ पत्थर मेरे सर लौट आता है

बहुत अरमान हैं शायद तुम्हारे मिलने से उसको
बिना दस्तक दिये दर से वो अक्सर लौट आता है

निशानी है बड़े होने की रखना खुद को काबू में
हदों से अपनी टकराकर समन्दर लौट आता है


मुआफी का भरम मेरा यकायक टूट जाता है
अचानक जब मेरा कातिल पलटकर लौट आता है

फतह की भी तमन्ना है मगर मुश्किल ये है राकि़म
दिखे मुश्किल अगर कोई तो डरकर लौट आता है

तुम्हारी हमारी कहानी मुकम्मल

Posted by Raqim


तुम्हारी हमारी कहानी मुकम्मल
कहे बिन हुई बेजुबानी मुकम्मल

पता ना चला आते जाते गली में
खर्च हो गई कब जवानी मुकम्मल

मजा मौसमों का जो लेने चले हम
रुत हो चुकी थी सुहानी मुकम्मल

किरदार किस्से के आधे अधूरे
न राजा मुकम्मल न रानी मुकम्मल

बर्दाश्त करने की आदत हमें है
गुजर जाता है सर से पानी मुकम्मल

तमन्ना यही है दोबारा मिलो तुम
हों बातें अधूरी पुरानी मुकम्मल

अदने बहुत हैं सलीके हमारे
हमारी मुसीबत सयानी मुकम्मल

तूफाँ के कद के बराबर नहीं है
राकि़म मेरी बादवानी मुकम्मल